Monday, November 25, 2024

पंक्चर रिपेयरवाला

  

 

#इन्दु_बाला_सिंह 

 

 

 

सुबह सात बजे ऑफ़िस जाते समय स्कूटी का टायर पंक्चर हो गया 

 

रश्मि के आँखों के आगे तारे नाच गये ।

 

सुबह सुबह टायर पंक्चर अब 

 

इतनी सुबह कहाँ मिलेगा  टायर पंक्चर रिपेयरवाला !

 

परेशान सी हो हो गयी वह ।

 

 सड़क के किनारे गाड़ी  खड़ी कर उसने लॉक लगाया और पैदल आगे बढ़ी वह पंक्चर रिपेयर दुकान की खोज में  ।

 

सारी दुकानें बंद थी ।

 

एकाएक उसकी निगाह एक पंक्चर रिपेयर दुकान पर पड़ी । 

 

दुकान खुली थी ।

 

रश्मि ने अपनी समस्या उस पंक्चर रिपेयरवाले को बतायी ।

 

दूर सड़क में उसकी गाड़ी खड़ी थी ।

 

पंक्चर रिपेयरवाले ने कहा  मैं टायर स्कूटी से खोल कर लाता हूँ ।

 

रश्मि की जान में जान आयी । 

 

एक जमाना था जब उसे स्कूटी ठेल कर दुकान तक लाना पड़ता था ।

 

वैसे सुबह सुबह ऑफ़िस जाते समय उसकी स्कूटी पंक्चर पहली बार हुई थी ।

 

अब तक जब भी स्कूटी पंक्चर हुई उसे घर में ही पंक्चर पड़ी मिली थी ।

 

एक बार बरसों पहले ऑफ़िस से लौटते समय भी हुई थी । तब उसे स्कूटी ठेल कर पंक्चर दुकान तक ले जाना पड़ा था ।

 

पंक्चर रिपेयरवाला टायर स्कूटी से खोल कर लाया ।

 

टायर में एक कील धंसी थी । दुकानदार ने टायर  रिपेयर दुकान में किया और फिर उसे  ले जा कर स्कूटी में लगा दिया ।

 

अपना मेहनताना उसने रश्मि से  सौ रुपये लिया ।

 

इस वक्त रश्मि को पंक्चर दुकानवाले की उपस्थिति ईश्वरीय अनुकंपा  सरीखी लग रही थी ।

 

रश्मि आगे बढ़ी ऑफ़िस की ओर । देर तो हो चुकी थी । उसने अपने बॉस को  स्कूटर पंक्चर के बारे में मेसेज कर दिया था ।

Tuesday, October 8, 2024

लड़की के विंब



#इन्दु_बाला_सिंह


1


 चार और छः साल की लड़कियाँ गरबा की पोशाक पहने बरामदे 

में अपने माँ और पिता के साथ खड़ीं थीं ।उन्हें देखते ही मेरी आँखों 

चमक आ गयी ।


मैं कह उठी - 


‘ क्यूटी गरबा करने जा रही है ? ‘


मेरी बात सुन कर दोनों लड़कियाँ शर्मा गयीं ।


‘ अरे ! इनको ख़ाली नाचना अच्छा लगता है ।’ बच्चियों के पिता कह उठे ।


बच्चियों की माँ ने आँखें नीची कर ली ।


बच्चियाँ झेंप गयीं 


2


सब्जी की दुकान पर पत्नी ने खोला भर सब्जी ख़रीदा ।


पति ने फल ख़रीदा ।


भारी भरकम झोला ले कर पत्नी चली पति महोदय एक किलो 

संतरा पॉली बैग में ले के चले ।



Sunday, September 29, 2024

ई रिक्शा में



#इन्दु_बाला_सिंह


मेरा बेटा उसी स्कूल में मिडल स्कूल पढ़ा जहां मैं 


शिक्षिका थी ।


बेटा एक क्लास में था । स्कूल जाते और आते समय 


मैं उसको हमेशा अपनी गोद में बिठा लेती थी । छोटे 


बच्चे का भाड़ा ई रिक्शा में नहीं लगता था ।


बेटे को लगता था शायद कि उसे मैं अपनी गोद में 


बिठा कर ले जाती हूँ । न जाने उसके मन में क्या 


भाव उठते थे ।


एक दिन बेटे ने ई रिक्शा में ही कहा -  मैं बड़ा हो 


जाऊँगा तब तुमको अपनी गोद में बैठा के ले 


जाऊँगा।


मैं चकित हुई  उसकी बात सुनकर ।

बरसात में ट्यूशन



#इन्दु_बाला_सिंह


मम्मी ट्यूशन के लिये अपने पाँच वर्षीय बेटे को ले जा 


रही थी  ।


बूँदाबाँदी बंद हो चुकी थी पर पार्क का रास्ता भींजा 


था ।


बेटा स्लीपर पहना था । वैसे बरसात में स्लीपर अच्छा 


रहता है ।


बेटा थोड़ी दूर चल कर अपने पंजे देखने लगा ।  


रास्ते के पानी से उसके पंजे भींज रहे थे ।


वह आगे जाना नहीं चाहता था क्यों कि उसके पैर 


भींज रहे थे । हो सकता है उसका ट्यूशन जाने का 


मन न हो इसलिये नख़रा कर रहा हो ।


मेरे बग़ल से जब बच्चे की मम्मी गुजरी तो हंस कर 


बोली -  बेटा बोलता है उसके पैर भींज रहे हैं ।


मैं बोल उठीं - वह गोद में चढ़ कर जाना चाहता है 


थोड़ी देर में बच्चे की मम्मी पलटी - बोलता है मैं भारी 


हूँ ।


मैं मुस्कुरा दी ।


आख़िर बच्चा भींगी सड़क पर ही चल कर अपने 


ट्यूशन टीचर के घर गया ।



बुढ़ापे की असहायता



#इन्दु_बाला_सिंह


‘ यहाँ नहीं रहेंगे कहाँ जायेंगे ? ‘ दुःखी मन से सुलेखा ने कहा ।


वह कहती जा रही थी - अपने पेंशन का पैसा खा रहे हैं हमलोग ।

जरा सा बेटे से बात कर लेती हूँ तो बहू की त्योरी चढ़ जाती है ।

गाँव में घर तो जॉइंट का है । एक कमरे में हमलोग अपना सामान 

रख कर ताला लगा दिये हैं । बेटी का आदमी भी काम नहीं करता 

है ।बेटी थोड़ा कमाती है मैं भी उसको हर महीने पैसे भेजती हूँ ।

अभी तो मेरा हाथ पैर चल रहा है । बीमार हो जाऊँगी तो क्या होगा ?


मैं मूक श्रोता थी ।


सुलेखा पति के साथ अपने बेटे बहू के पास रह रही थी ।


सोंच रही थी बुढ़ौती कितनी अपमानजनक और कष्टदायक होती है ।



?

Saturday, September 21, 2024

बेटी की गोद भराई



#इन्दू_बाला_सिंह 


ज्योतिका का  घर पूरा था । सास ससुर तीन देवर और एक ननद।


घर में झाड़ू बर्तन के लिए कामवाली थी पर तीन समय खाना बना के हल्कान रहती थी वह । गर्मी के मौसम एक घंटे  पसीने में 

रोटी बनाते बनाते पसीने में नहा जाती थी वह। घर का कोई सदस्य उसे रसोई में सहायता नहीं करता था । पच्चीस वर्षीय ज्योतिका को किसीसे कोई शिकायत नहीं थी । फिर शिकायत तो अपनों से की जाती है ।


ब्याह के तीन साल बाद ज्योतिका मां बननेवाली थी । पांच महीने के बाद गोद भराई की रस्म करने के लिए पहुंचे उसके ससुराल मेरे माता पिता।


बेटी को पसीने में नहाई रोटी बनाते देख मां  तड़प उठी । उसने कहा दो मैं बनाती हूं रोटी और बेटी के हाथ से बेलन छीन लिया ।


ज्योतिका अपमानित हो उठी । पर कसक के रह गई ।


उसकी सास अपने बिस्तर पर लेट कर अपनी उपन्यास की पुस्तक में लीन थी और मां उसकी ससुराल में सबके लिए रोटी बना रही थी ।


ज्योतिका की गोद भराई कर के दूसरे दिन ज्योतिका के मारा पिता वापस लौट गए । 


ज्योतिका के सुख दुःख का ख्याल रखना उसके पति की जिम्मेवारी थी। और पति महोदय एक अच्छे पुत्र और भाई थे ।


रात में नशे में लौट खा पी कर मस्त अपने भविष्य से निश्चित सोनेवालों में से थे ।



धूप में खिलती बगिया



#इन्दू_बाला_सिंह


पिता ने अपने  जीते  जी रमी का राशन कार्ड बनवा दिया था । उसे  अलग ख़ाना बनाने बोले थे । हर मुसीबत में वे अपनी बेटी के साथ खड़े थे । 


चार बच्चों की माँ रमी को अपने भरोसे जीना सिखाना चाहते थे । पिता माँ आख़िर कितने दिन साथ रह पायेंगे । उनका उतरने का स्टेशन तो पहले ही आनेवाला था । रमी का जीवनसाथी उसे किराये  के घर में छोड़ कर ग़ायब हो गया था । और रमी जीवन की धूप  झेल रही थी ।


पिता अपनी बेटी के नाम भी अपने मकान में एक कमरा लिख गये ।


पिता माता के गुजरने के बाद अब उसके बच्चे थे । उन बच्चों पर बहुतों की निगाहें थीं । आख़िर अकेली औरत कितनी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा दे पायेगी अपने बच्चों को ?


मेरे सामने वह परिवार पल रहा था । 


मैंने सोंचा - काश रमी दूसरा ब्याह कर लेती किसी ज़रूरतमंद और पैसेवाले इंसान से ।


मेरे मन ने प्रश्न किया - तो क्या बच्चे दूसरे व्यक्ति को अपना पिता मान पाते ? शायद कभी नहीं ।


अपने बच्चों की ज़िम्मेवारी के स्नेह बंधन में बँधी निश्चिंत थी रमी।


#indubalasingh #laghukatha

भाई मिला



#इन्दु_बाला_सिंह 


मेरी नौ और दस वर्षीय   दोनों बेटियां बैठी हुईं हैं सामने 


वे मुझे डॉक्टर की पारदर्शी खिड़की से दिख रहीं हैं 


आज फिर याद आया यूं ही वह दृश्य….


यह सिलसिला सात माह तक चला था


डॉक्टर ने कहा -


डिलीवरी के बाद फैमिली प्लानिंग का ऑपरेशन करवा लेना ……


और मुझे चिंता रहती थी तीसरी बार फिर बेटी हुई तो क्या होगा..


तीन तीन बेटियां !


पिता के घर में रहना 


कम तनख्वाह वाली नॉकरी से मैटरनिटी लीव

 

पति की कोई आमदनी नहीं .…


पर 


शायद ईश्वर ने सुन ली थी


नवें महीने में भारत बंद के दिन पुत्र मिला 


खुशी से नींद न आई


डॉक्टर का दिया  नींद का इंजेक्शन भी फेल हो गया .…


मेरी बेटियों को भाई मिला।



ग्यारहवीं कक्षा की छात्रा



#इन्दु_बाला_सिंह


‘आपने सुना ! अनन्या ने सुसाइड कर लिया है । 


पढ़ाई में तो ठीक ठाक थी । न जाने क्यों उसने 


ऐसा कदम उठाया ।’


‘ अरे ! कब !’ मैं अपनी पड़ोसन का कथन सुन 


चौंक पड़ी  ।


मेरे लिये यह झटका था । 


मैंने उसे एक बार पार्क में खेलते हुये देखा था । 


उस  ग्यारहवीं कक्षा की छात्रा का चेहरा मेरी 


आँखों के सामने कौंध गया ।


पड़ोसन बोली - ‘ सुसाइड का कारण अभी तक 


पता नहीं चला है  । ‘


मैं सोंचने लगी -


कितनी शांत  शिष्ट लड़की थी । 


सड़क से अपने घर में लौट आई मैं ।


चुपचाप सोंचने लगी -


आख़िर किसका दोष है । माँ बाप की इकलौती 


संतान का ये अंत ! .. हो सकता है कोई उसे 


आनलाइन धमकी दे रहा हो । उसकी फ़ोटो 


किसी पोर्न साईट पर डाल दिया हो । मेरे दिमाग़ 


में कितनी बातें घूमने लगीं । 


लड़की को बड़ा करना , उसे समझदार और 


ज़िम्मेदार इंसान बनाना भी कितना कठिन काम 


है । 


अख़बार की खबरों में लिखा रहता है लड़कियों 


के लिये समाज ख़तरनाक होता  जा रहा है ।


काश स्कूलों में हर महीने टीचर पैरेंट मीटिंग 


होती । 


शिक्षक और अभिभावक् बच्चे के क़रीब आ पाते ।


ख़ाली घटना होने पर  सोंचने से तो कुछ नहीं 


होगा । 


-मैंने सोंचा ।


काश शिक्षक अनन्या  का मन पढ़ पाते ।


आज तो एक की नौकरी से घर चलाना मुश्किल 


हो गया है । माँ बाप दोनों अपनी  अपने नौकरी 


बचा पाने में संघर्षरत हैं ।


अनन्या की याद आते  ही मेरा  दिल बैठ गया ।


काश पड़ोसन की  खबर झूठी हो ।


और दूसरे दिन  शहर के समाचारपत्र के दूसरे 


पन्ने पर स्कूल के नाम के साथ अनन्या के 


सुसाइड की खबर छपी थी ।



Saturday, September 7, 2024