#इन्दु_बाला_सिंह
सुबह सात बजे ऑफ़िस जाते समय स्कूटी का टायर पंक्चर हो गया ।
रश्मि के आँखों के आगे तारे नाच गये ।
सुबह सुबह टायर पंक्चर अब !
इतनी सुबह कहाँ मिलेगा टायर पंक्चर रिपेयरवाला !
परेशान सी हो हो गयी वह ।
सड़क के किनारे गाड़ी खड़ी कर उसने लॉक लगाया और पैदल आगे बढ़ी वह पंक्चर रिपेयर दुकान की खोज में ।
सारी दुकानें बंद थी ।
एकाएक उसकी निगाह एक पंक्चर रिपेयर दुकान पर पड़ी ।
दुकान खुली थी ।
रश्मि ने अपनी समस्या उस पंक्चर रिपेयरवाले को बतायी ।
दूर सड़क में उसकी गाड़ी खड़ी थी ।
पंक्चर रिपेयरवाले ने कहा - मैं टायर स्कूटी से खोल कर लाता हूँ ।
रश्मि की जान में जान आयी ।
एक जमाना था जब उसे स्कूटी ठेल कर दुकान तक लाना पड़ता था ।
वैसे सुबह सुबह ऑफ़िस जाते समय उसकी स्कूटी पंक्चर पहली बार हुई थी ।
अब तक जब भी स्कूटी पंक्चर हुई उसे घर में ही पंक्चर पड़ी मिली थी ।
एक बार बरसों पहले ऑफ़िस से लौटते समय भी हुई थी । तब उसे स्कूटी ठेल कर पंक्चर दुकान तक ले जाना पड़ा था ।
पंक्चर रिपेयरवाला टायर स्कूटी से खोल कर लाया ।
टायर में एक कील धंसी थी । दुकानदार ने टायर रिपेयर दुकान में किया और फिर उसे ले जा कर स्कूटी में लगा दिया ।
अपना मेहनताना उसने रश्मि से सौ रुपये लिया ।
इस वक्त रश्मि को पंक्चर दुकानवाले की उपस्थिति ईश्वरीय अनुकंपा सरीखी लग रही थी ।
रश्मि आगे बढ़ी ऑफ़िस की ओर । देर तो हो चुकी थी । उसने अपने बॉस को स्कूटर पंक्चर के बारे में मेसेज कर दिया था ।