Sunday, January 17, 2016

औलाद ही मित्र है ‪ ( लघु लेख‬ )

 #‎लघु_लेख‬

- इन्दुबाला सिंह


शिक्षक का इतना बड़ा योगदान है बच्चे के विकास में कि उसका वर्णन करना नक्षत्रों  की दूरी नापना जैसा है । शिक्षक अगर जन्मदाता हुआ तो क्या बात है । बच्चे के कच्चे मन पर शिक्षक के शब्दों का प्रभाव तो पड़ता ही है  पर शिक्षक   के जीवन शैली और व्यवहार के माध्यम से  उस पर  कुछ ज्यादा गहरा प्रभाव  पड़ता  है । अपने निकटस्थ  रक्तसम्बन्धी  , पड़ोसी मित्रों की जीत हार का अमिट  प्रभाव पड़ता है हर  बच्चे पर ।

 आफिस में , रिश्तेदारों में , घर  में आयी समस्याओं का दूरीकरण हम किस प्रकार करते हैं यह हमारी औलाद  हम से ही सीखती   है क्यों कि वह हमपर विश्वास  करता है । हमारी औलाद वह घड़ा है जिसे हम तैयार करते हैं अपनी आंच में । स्कूल के पढ़ाये पाठ जब हम अपने बच्चे के मुंह से समझते हैं तब हम अपने बच्चे का मन पढ़ते  हैं । यहां मैं  सोंचती  हूं कि सबसे पहले    हमें यह     समझना चाहिये की हमारी औलाद ही हमारी प्रिय मित्र है । हमारा बच्चा पैदा होते ही  हम पर निर्भरशील नहीं होता है बल्कि हम उसपर निर्भरशील होते हैं । वही हमारा ऐसा प्रतिरूप होता है  जो अपना अलग अस्तित्व रखे होता  है । हमारा प्रतिरूप हमारी औलाद अर्थात हमारा बेटा या बेटी हमसे जो पाती है वही अपने मन के   बैंक में सुरक्षित रखती है और फिर उसे हमें हमारी जरूरत के अनुसार हमे निकाल कर देती है ।

परिवार के लिये त्याग का पाठ स्कूल में पढ़ हम उस आलोचना को फिर से समझने के लिये जब बालमन  घर में कोई मित्र नहीं पाता है तो वह स्वयं अपने कच्चे हाथों से अपने मन को रूप देने लगता है ,  आदर्श तलाशता है , किसी  अजनबी को  गुरु बनाता  है ।  कायरों की भाषा में कहूं तो भाग्य के भरोसे हो जाता है ।

हम कितने भी अनपढ़ या अज्ञानी क्यों न हों हम यह न भूलें कि हमारे पास अनुभव है और हमारी औलाद हमारी प्रिय मित्र है । 

Friday, January 15, 2016

गवंई चूहा ( लोक कथा )


- इंदु बाला सिंह


दो मित्र चूहे थे । दोनों गांव में रहते थे ।
एक दिन शहर से आयी एक कार गांव में । एक चूहा कार को देखने चढ़ गया उसके अंदर । नई कर वह खुश हुआ । इसी बीच कार का ड्राइवर आया और कार ले कर चल पड़ा ।
अब परेशान हो गया चूहा । उसे पता ही नही चल रहा था की वह कहां जा रहा है । एक जगह जैसे ही कार रुकी चूहे की जान में जान आयी । ड्राईवर कार का दरवाजा ज्यों ही खोला चूहा पलक झपकते ही बाहर निकल कर भागा ।
बचते बचाते चूहा एक होटल में पहुंच गया ।
रात का समय था । जूठे बर्तनों का ढेर था । प्लेटों में पड़े जूठन खा कर पेट भरा चूहा और फिर लकड़ी के डब्बों के ढेर में दुबक गया । अब चूहे को अपना घर गांव व मित्र याद आने लगे ।
दिन बीतते गये । अब वह पूरा शहरी हो गया था । वह मोटा चमकीली आंखोंवाला शहरी चूहा अब बलिष्ठ हो चुका था ।
बहुत दिनों बाद शहरी चूहे को अपने गांव और माता पिता की याद आयी ।
आखिर एक दिन राह ढूंढते ढूंढते वह अपने गांव पहुंच ही गया ।
गांव पहुंचने पर शहरी चूहे ने देखा कि उसके माता पिता भाई बहन कोई नहीं हैं । अपने मित्र चूहे से गांव की कथा सुन बड़ा दुखी हुआ चूहा । गंवई चूहे का परिवार बड़े कष्ट में जी रहा था ।
गंवई चूहे ने शहरी चूहे की बातें सुन सोंचा कि क्यों न कुछ दिन शहर घूम आया जाय ।
और दोनों मित्र शहर लौटे ।
अपने मित्र चूहे को होटल में जूठे प्लेट की जूठन जल्दी जल्दी खाते देख गवंई चूहा घबरा गया । उसे घिन आने लगी । वह उसी पल लौट पड़ा अपने गांव ।
गंवई चूहे का मोह भंग हो चूका था | अब वह अपने गांव के खेत की फसल खा कर अपने कुनबे में खुश था ।

Thursday, December 24, 2015

पुस्तकों की दयनीय स्थति




- इंदु बाला सिंह




- आंटी ! किताब लीजिये ।

एक दुबला पतला काला सा टाई लगाया सेल्समैन गेट के बाहर ही खड़ा हो दिखाने लगा किताब ।

- नहीं नहीं मुझे नहीं चाहिये किताब ।

घबरा कर कहा मैंने ।

मुझे उस सेल्समैन की स्थिति बड़ी दयनीय लग रही थी ।

- ले लीजिये आंटी बहुत अच्छी अच्छी रेसिपी की किताब है ।

- सब कुछ तो नेट में मिल जाता है । मुझे नहीं चाहिये किताब ।

मना तो कर दी फिर लगा ..... कैसे मर रहीं हैं पुस्तकें नेट के कारण ।

- आप  पुस्तकें किसी को गिफ्ट दे दीजियेगा ।

- नहीं नहीं ।

और मैं पुस्तकों की दयनीय स्थिति पर दुखी हो गई । 

Thursday, December 17, 2015

किताबवाला



- इंदु बाला सिंह


- वो किताब दिखाईये ।

-  एंट्रेंस की किताब है ।

मुंह टेढ़ा किया किताब  की दुकानवाले ने ।

किताब देखने को माँगनेवाला आगे चल कर इंजीनियर बना ।

और फिर एक दिन -

-  किताब दिखाईये ।

- वो एम० बी ० ए ० एंट्रेंस  की किताब है ।

आज फिर मुंह टेढ़ा हुआ किताबवाले का ।

बच्चे के साथ उसकी मां  भी थी । अपमानित हुयी  वह ।

यह वही किताब देखने को मांगनेवाला पहला बच्चा था ।

किताब देखने को मांगने पर अपमान से तिलमिलानेवाला बच्चा आज देश के प्रतिष्ठित कालेज से एम
०  बी० ए ० किया और  एक बड़ी कम्पनी में उच्च पदस्थ हुआ ।

Thursday, December 3, 2015

ज्ञानी गृहस्थ( लोक कथा )










एक  फकीर था ।

वह  प्रतिदिन एक गांव जाता था और  वहां के किसी मेहनतकश , ईमानदार और   धनी व्यक्ति के घर भोजन करता था ।

इसी क्रम में एक दिन  माणिक लाल के घर पहुंचा ।

माणिक लाल ने फकीर को बड़े  प्यार से  आसन दिया ।  उसके सामने विभिन्न प्रकार के पकवान परोसा ।

भोजन शुरू करने से पहले फकीर ने माणिक लाल की सम्पत्ति जानने चाही । फिर उसने माणिक लाल  पुत्रों के बारे में जानना चाहा ।

माणिक लाल ने कहा  -


' अतिथि महोदय ! मेरी  संतान है और मेरे पास एक हजार  मुद्रायें हैं । '

इतना सुनते ही फकीर आग बबूला हो उठा ।

' नीच ! तू सच बोलता तो क्या मैं तेरा धन ले लेता ।  सुना है कि तेरे पास अपरम्पार धन सम्पत्ति है । तेरे  चार पुत्र हैं । मैं  अन्न ग्रहण नहीं कर सकता । ' फकीर कुपित हो कर   बोला ।

माणिक लाल ने नम्रता  पूर्वक  कहा कि महोदय ! आप मेरी बात सुन लें फिर आप मुझे झूठा साबित  चाहें तो वह आपकी मर्जी ।


' महोदय ! मेरे चार पुत्र हैं । इनमे से मेरे तीन पुत्र पियक्क्ड़  हैं वे कुछ काम  धाम नहीं  हैं । जब उनको पैसों की  जरूरत पड़ती है  वे मुझे  याद करते हैं । वे मेरा धन नष्ट कर रहे हैं । इसीलिये उन तीनों पुत्रों को  मैं अपनी संतान नहीं मानता ।.....  मेरा चौथा पुत्र  मेरी दूकान में मेरी सहायता करता है । और मैं हजार की मोहरें दान व धर्म कार्य  के लिये रख छोड़ा है । '

यह सुन फकीर प्रसन्न हुआ  उसने कहा कि माणिक लाल तू तो मुझसे ज्यादा ज्ञानी है  मैं तेरे साथ भोजन ग्रहण करूंगा ।





Wednesday, December 2, 2015

अकृतज्ञता की सजा



-इंदु बाला सिंह


एक जंगल में एक साधू रहता था ।
साधू अपनी अपनी कुटिया में मनन चिंतन में लीन रहता था ।

एक दिन जब साधू समाधिस्थ था तब एक चूहा साधू  के शरीर पर उपर  नीचे होने लगा ।
साधू की समाधि टूट गयी ।


' क्या बात है ? तुम्हे क्या चाहिये ? ' - वे चूहे को  देख हंस कर बोले ।

' महात्मन्  ! मैं  बहुत छोटा हूं । मुझे बिल्ली से बड़ा डर लगता है । आप मुझे बिल्ली बना दीजिये । ' चूहे ने  हाथ जोड़ कर कहा ।

 साधु ने कहा -

' तथास्तु '

और पल भर में चूहा बिल्ली बन गया ।

कुछ दिन बाद बिल्ली बना चूहा फिर साधु के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया -

' महात्मन् ! जंगल में शेर सबसे शक्तिशाली है और मुझे शेर से डर लगता है  । कृपा कर के आप मुझे शेर बना दीजिये । '

साधू मन ही मन मुस्काये फिर उन्होंने कहा -

' तथास्तु '

पल भर में चूहा शेर बन गया और दहाड़ते हुये साधू की कुटिया से चला गया ।

बहुत दिनों के बाद एक बार साधू  जंगल से शहर की और जा था तभी राह में उसे  चूहे से बना शेर मिल गया ।

साधू को देख  शेर दहाड़ा बोला -

'आज मुझे बहुत भूख लगी है मैं तुझे खाऊंगा । '

चूहे की अकृतज्ञता  देख साधू बहुत दुखी हुआ ।

' जा..... तू पुनः चूहा बन जा । ' - कहते हुये साधू  ने शेर पर अपने कमंडल का जल छिड़क दिया ।

पल भर में शेर चूहा बन गया ।

और झाड़ियों छिपी बिल्ली अचंभित चूहे को चट कर गई । 

Sunday, November 29, 2015

पुरानी आंटी और याद



-इंदु बाला सिंह


आज मेरे घर आयी थी मेरी एक पुरानी आंटी ( फ्रेंड आंटी ,दीदी कुछ भी कह  भी सकते हैं ) ।

' क्या करती है तुम दिन भर आती नहीं मेरे घर । क्या करती हो तुम दिन भर ? '

' ऐसे ही  , थोड़ा बहुत लिखा करती हूं । कहानी वैगरह । '

आंटी जी ने बड़ी बड़ी आँख कर मेरा चेहरा देखा । फिर बोली -

' तुम तो नाटक लिखी थी न । हम लेडीज लोग नाटक किये थे । '

मैं चौंक गयी । फिर याद आया -

कालेज डेज में मैंने लिख  के दिया था उन्हें एक  नाटक  क्लब में एक्ट करने के लिये ।