Friday, August 9, 2013

मोमबत्ती में पढ़ती आकृति

 बिजली चले जाने पर उस  छोटे से घर की खिड़की से झांकती मोमबती की रोशनी में टेबल पर झुकी आकृति ने सरिता के मन में सदा एक उत्सुकता बनायी रखी |
इसका भी एक कारण था बगल में उस युवा के चाचा का विशाल मकान था जो कि अँधेरे में भी जनेरेटर की रोशनी से जगमगाया रहता था |
कैसे लोग रहते हैं ? काश उस लड़के को बरामदे में ही पढ़ने की जगह दे देते |....वह सोंचती थी
शहर छूटा पर वह खिड़की वाली आकृति याद रही |
चार वर्ष पश्चात् सरिता ने  एक पुराने परिचित से उस  युवा  के बारे में पूछा |
" अरे  भाभी ! वो तो आई ० ए ० एस ० बन गया है | "
सरिता की आंखें सजल हो उठीं | 

वह आकृति  सदा उसकी आंखो में बसी रही | 

बहन एक बोझ है

संस्कृत की अध्यापिका श्रीमती श्रीनिवासन दक्षिण भारतीय का बेटा भी मां के ही विद्यालय में छठी कक्षा में पढ़ता था |
सुना था सहकर्मियों से उनके घर जाओ तो वह होटल से मंगा कर सबको नाश्ता कराती है | वह भाई भाभी के साथ रहती है | भाई भाभी जब खा कर कमरे में चले जाते हैं तब अपना खाना निकाल कर बेटे के साथ खाती है |
" आप के पति कब एक्सपायर हुए ? " वह ससंकोच पूछ बैठी उस संस्कृत की अध्यापिका से एक दिन कामन रूम खाली पा कर |  उसने सहज ढंग से उसने उत्तर दिया |
" दीदी ! मेरे पति रेलवे में काम करते थे |शादी के एक माह बाद ही एक्सीडेंट हो गया मेरे पति का | मेरे पिता ससुराल से मुझे लाकर अपने पास रख लिए | जिस घर में मैं रहती हूँ उसे मेरे पिता ने मेरे और मेरे भाई के नाम कर दिया था | पर कौन पूछता है बहन को ? मेरा बेटा बड़ा हो जायेगा तब मैं अपने लिए एक अलग घर खरीद लूंगी | "

तीन वर्ष बाद उस शहर को छोड़ कर चली गयी वह |
दस वर्ष बाद एक दिन उस संस्कृत की अध्यापिका की खबर मिली |

उस शिक्षिका ने जमीन खरीद कर अपना घर बनवा लिया है और उसका बेटा कालेज में पढ़ रहा है |

Monday, August 5, 2013

बहन की देखभाल

सुनीता के बगल के बेड पर सिस्टर एक तीस पैंतीस वर्ष की आदिवासी पेशेंट को लेटने कह कर चली गयी | 
पूछने पर पता चला उस पेशेंट का गायिनिक का आपरेशन है | वह परिवार चालीस किलोमीटर दूर से आया था | वह पेशेंट अविवाहित थी | भाई के साथ रहती थी इसलिए  उसे कम्पनी के अस्पताल में फ्री मेडिकल फैसिलिटी थी |
भाई अपनी पत्नी को बहन के पास छोड़ कर बोला .... अभी आता हूँ ....और चला गया | दुसरे दिन भी न लौटा |
दुसरे दिन उस पेशेंट का आपरेशन भी हो गया |
बेहोश पेशंट को वापस बेड पर ला कर सुला दिया गया | हाथ में सैलायिन बोतल लगा था |
ननद को तो खाना नहीं चाहिए था | भाभी हास्पिटल से खाना ले कर खा  ले रही थी | अपने दस वर्षीय बच्चे के साथ जमीन पर सो जाती थी |

सुनीता आश्चर्य से देख रही थी किस तरह भाई अपनी पत्नी को अपनी बहन की देखभाल के लिए छोड़ गया था |

Sunday, August 4, 2013

मित्रता

" मैंने मित्रता कर ली है अपने भूत से | " श्रेया ने हंस कर कहा |

" वो भला कैसे ? "

" अरे ! छोटी सी बात है ...मैं अपने घर में सदा एक बुजुर्ग रिश्तेदार रखी रहती हूँ | "

मांग सूनी है भई !

स्निग्धा चार बच्चों की माँ थी ... तीन बेटी और एक बेटा |
पति महोदय दस वर्ष पहले ही कहीं चले गये थे | और किसी ने खोजा भी नहीं था उन्हें |
स्निग्धा  नौकरी कर के अपने चारों बच्चों का लालन पालन कर रही थी | वह काम पर जाते वक्त साधारण कपड़े पहनती थी | उसके चेहरे पर इतनी गरिमा रहती थी कि कोई उससे व्यक्तिगत प्रश्न पूछ ही नहीं पाता था |
भाई का विवाह तय हुआ | विवाह में बरती बन कर जाना था उसे |
सज धज कर जब निकली वह अपने बच्चों के साथ |
" अरे ! मांग सूनी है बिटिया की .. सिन्दूर लगा दो भई !..." चाची ने कहा और लपक के स्निग्धा की मांग में सिन्दूर लगा दी |

चेहरा दमक गया स्निग्धा का पर  मन भींग गया |

लड़की की लड़ाई

" हमें कुछ नहीं चाहिए ...केवल लड़की चाहिए | " मंडप में समधी का ये वाक्य सुनते ही पिता ने एक सूटकेस कपड़े के साथ विदा कर दिया बेटी |
पति निकम्मा ,सास ससुर मौन ,जेठ जेठानी शेर | कुछ ही दिनों बाद लड़ाई झगड़ा के बाद  हाथ भी चलने लगा जेठ का | पोस्टमैन पिता की बेटी  सुरुची बिलबिला उठी | मैके गयी तो वापस लौटने का नाम न ली |
कुछ माह पश्चात ससुर विदा कराने गए बहु तो सुरुची दौड़ पड़ी गंगा की ओर डूबने |
" बिटिया नहीं जाना चाहती तो मैं क्या करूं | " दुखी मन से बोले लड़की के पिता |
किसी तरह हाथ जोड़ कर विदा किया सुरुचि के पिता ने शहरी समधी को |

सुरुचि के पति को तो कोई लड़की न मिली व्याहने को पर एक पुत्र पैदा हुआ सुरुचि को और कालान्तर में सैनिक बन उसने  देश की सेवा की व माँ की शान भी वह  रखा |

पागल सुधीर

माता पिता मस्त थे बेटा सुधीर भी अपनी दुनियां में खुश था | मेट्रिक भी न पास कर सका वह |

ठगी और चोरी चमारी भी न सीख सका सुधीर | सीधा सादा युवा आज की दुनिया का स्वाभिमानी मूर्ख बन गया था |रिश्तेदार उसे पागल कहते थे | पत्नी रख न पाया माँ की भी मृत्यु हो गयी | वैसे लगभग चार करोड़ मकान का मालिक सुधीर और उसके बड़े भाई थे |

खुद काम ढूंढ न पाया और पिता भी उसे किसी काम में लगवा न पाए |

एक दिन देखा मैंने सड़क के किनारे बैठ कर सुधीर किसी की हजामत बना रहा है | वैसे कोई काम छोटा नहीं होता पर उस क्षत्रिय पुत्र को हजामत बनाते देख दुख हूआ |


फिर सुना शहर के एक क्लब में बेयरे की नौकरी लग गयी है उसे | पी ० एफ ० और मेडिकल फैसिलिटी भी मिल रही है उसे | पी ० एफ ० का नामिनी उसने अपने भाई के पुत्र को बना दिया है |