-इंदु बाला सिंह
....माँ जी !....भैया का फोन आया था |
....अच्छा !
....पूछ रहा था ... माँ कैसी है ?
...अच्छा !....मुझे तो नहीं आया ?...
मकान के आउट हॉउस में नौकर का परिवार रखा गया था माँ की देखभाल के लिये |
-इंदु बाला सिंह
....माँ जी !....भैया का फोन आया था |
....अच्छा !
....पूछ रहा था ... माँ कैसी है ?
...अच्छा !....मुझे तो नहीं आया ?...
मकान के आउट हॉउस में नौकर का परिवार रखा गया था माँ की देखभाल के लिये |
-इंदु बाला सिंह
' फूलवाला !....फूलवाला ! '
एक छोटे डंडे में मल्ली फूल छोटी छोटी लड़ी लटका कर वह हर रोज शाम के पांच से साढ़े पांच के बीच हमारे मोहल्ले में आवाज लगाया करता था | उसकी आवाज आँखों में मेरी चमक ला देती थी | एक लड़ी का मूल्य था पचास पैसे | हर रोज मैं उस से फूल की एक लड़ी खरीदती थी और अपनी दो वर्षीय बिटिया के बालों में क्लिप से लगा देती थी | उसका खिला चेहरा देख मन प्रसन्न हो जाता था |
कुछ ही दिनों में हर रोज पचास पैसे खुचरा फूल के नाम से अलग रखना मुझे कठिन लगने लगा |
' सुनो ! ऐसा करो हर महीने एक साथ पैसे ले जाना | ' ---- एक दिन मैंने फूलवाले से कहा |
' ठीक है ..दीदी ! ' ----- वह खुश हो गया था | उसे एक ऐसा ग्राहक मिल गया जो उससे पूरे महीने फूल खरीदेगा |
तीन माह तक फूलवाला आता रहा | एक दिन मैंने सुना दंगा छिड़ा है | फूलवाला भी आना बन्द हो गया | दिन बीते मास बीते वर्ष भी बीत गया पर वो फूलवाला न आया | मै सोंचने लगी कहीं चला गया शायद | अवचेतन मन में डर सा लगा | कहीं किसी ने मार तो नहीं दिया !
फूलवाला न आया कभी |
याद आता है आज भी वो फूलवाला |
१९७२
-इंदु बाला सिंह
श्रीमती जी ने दूध माप कर बर्तन में डालती हुयी दूधवाली से पूछा - तेरी लडकी की शादी ठीक ठाक हो गयी न ?
--- हाँ बीबी जी |
--- दामाद क्या करता है ?
--- मास्टरी करता है |
--- मैट्रिक पास करके ?
--- नहीं जी ! बी. ए. पास कर के |
मारे आश्चर्य के श्रीमती का मुंह खुला का खुला रह गया |
--- उसके पास जमीन जायदाद है ?
--- तीस बीघा जमीन है |
--- क्या क्या दिया लड़की को ?
--- तीन ठो चांदी की सिकड़ी |
--- तुम लोग रूपया नहीं देते ?
--- नहीं बीबी जी |
--- हम लोगो का तो शादी पर बहुत खर्चा होता है | हमने तो अपनी लड़की को कंगन , चूडियाँ , हार , अंगूठी , रेडियो ,
सोफा , पलंग और ऊपर से तीन हजार रुपया भी दिया है |
--- तब तो आपका दामाद बहुत पढ़ा लिखा होगा | बड़े बड़े खेत खलिहान होंगे उसके पास|
श्रीमती जी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया | दूधवाली से अपना बरतन पकडती हुयी बोली --- आज तो दूध पतला लग रहा है |
#इंदु_बाला_सिंह
पंद्रह वर्षीय ऋद्धि को हरी मटर खाना बहुत पसंद था ।उसने अपनी माँ से मटर लिया स्टील के कटोरे में और एक स्टील के छोटी थाली ले कर अपने घर के बाहर के बरामदे में बैठ गयी ।
माँ रसोईं घर में खाना पका रही थी ।
ऋद्धि मटर छिल रही थी और दाने खाती जा रही थी ।
मटर के फलियों के छिलके जमा होते जा रहे थे थाली में और कटोरा खाली हो रहा था ।
मटर छिलते समय एक मटर का दाना थाली के छिलकों के ढेर में जा गिरा ।
‘ अरे! एक मटर का दाना गिर गया ।… जाने दो एक दाना गिर गया तो क्या हुआ ।’ - ऋद्धि ने सोंचा ।
फिर उसे कहानी की वह चिड़िया याद आयी जिसका एक डाल का दाना पेड़ के ठूँठ में गिर गया था । उस चिड़िया ने अपना दाना पाने के लिये कितना परिश्रम किया ।और वह थाली के छिलकों के बीच से अपना दाना नहीं ढूँढ सकती है ।
ऋद्धि थाली के छिलकों को हटाने लगी । बीच में उसे मटर का दाना दिखा ।
ऋद्धि मटर का दाना खा ली ।
फिर से कटोरे के बची मटर की फलियों को छील कर खाने लगी ।