Monday, December 22, 2025

भगवान पर विश्वास


 

 

" मैं हर महीने चार सौ पुजारी को देती हूं  । हमारे मुहल्ले के मंदिर में हर सोमवार को भगवान की पूजा होती है शाम को छः से सात बजे के बीच में । भगवान को भोग लगता है । फिर बच्चे खाते हैं खाना । जिसकी जितनी इच्छा उतना पैसा देता है । जो कम पैसा देता है उसके लिए पंडित देर से रात आठ नौ बजे तक आते हैं । अब सोचिए भगवान बोल नहीं सकते पर भूख तो उनको भी लगती है । और उसके बाद रात में बहुत से बच्चे सो भी जाते हैं ।"

 

मैं सुन रही थी अपनी कामवाली की बातें ।

 

" मैं तो मंदिर में पंखा भी दान की हूं । भगवान को भी तो गर्मी लगती है।

 

भगवान को दान करती हूं इसीलिये तो मेरे बेटा बेटी अच्छा से हैं । "

 

मैं  सोंच रही थी कि यह कामवाली के विचार हैं । गरीब है पर भूखी नहीं है । आमदनी है । और लोग बोलते हैं कि हमारे पास काम नहीं है । बेरोजगार हैं वे । निठल्ले से पान सिगरेट की दुकान पर बैठे रहते हैं ।

Wednesday, December 17, 2025

शहर में मजदूर

 

 

 

काम करवाते हैं पर पी० एफ० नहीं । पेंशन की गुंजाइश नहीं । आठ हजार रुपए तनख्वाह पर । सच्चिदानंद नाम था उसका। लोग उसे सची कह के बुलाते थे । वह हमारे घर कुकिंग गैस का सिलेंडर पहुंचाता था । गैस चूल्हा भी इतवार को आ कर रिपेयर कर देता था ।

 

इस बाची जब सिलेंडर पहुंचाने आया तो मायूस था ।

 

' दीदी अगले महीने मैं रिटायर हो जाऊंगा । '

 

मैं चौंक गई

 

तो अब क्या करोगे ?- मैंने पूछा

 

' गांव चला जाऊंगा । गांव मे मेरे पिता है '

 

' और वहां करोगे क्या ? '

 

' गांव में हमारा खेत है । घर है । '

 

मैने सोचा कितना खेत होगा ? छोटा सा खेत होगा मकान होगा जिसमें बहुत से रिश्तेदार रहते होंगे ।

 

सची की पत्नी तो जल कर मर गई थी किचेन मेएक बेटा है अब जो काम मिले तो करता है वरना घर में बैठा रहता है । मतलब पिता पर निर्भर है । पांच छः साल पहले एक्सीडेंट में पैर दोनों टूट गए थे उसके । दयालु व्यक्तियों की सहायता से जिंदगी बचीकमजोर टांगों से साइकिल खींचता है वह

 

बुढ़ापा कितना कष्टदायक होगा सची का मैसमझ सकती हू